शिव पुराण की चमत्कारिक कथा - अध्याय 2

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शिव पुराण की चमत्कारिक कथा - अध्याय 2

अध्याय 2

देवराज का उद्धार

बहुत समय पहले किरातनगर नामक एक नगर था। वहाँ देवराज नाम का एक ब्राह्मण रहता था। जन्म से वह ब्राह्मण था, परंतु उसके जीवन में ब्राह्मणोचित आचरण का धीरे-धीरे लोप हो गया था।

वह अत्यंत निर्धन था। जीविका चलाने के लिए वह नगर में रस बेचता था। गरीबी और परिस्थितियों ने उसके मन को कठोर बना दिया था। धीरे-धीरे उसका झुकाव धर्म से दूर और सांसारिक सुखों की ओर बढ़ता गया।

वह स्नान, संध्या, जप और वैदिक कर्मों से विमुख हो गया। जिन कर्तव्यों को उसके जीवन का आधार होना चाहिए था, वे उसके लिए महत्वहीन हो गए। धन प्राप्त करने की इच्छा उसके भीतर इतनी प्रबल हो गई कि उसने उचित और अनुचित का भेद करना भी छोड़ दिया।

देवराज छल-कपट में निपुण होता गया। वह अपने विश्वास पर आए लोगों को धोखा देता और उनकी संपत्ति हड़पने का प्रयास करता। ब्राह्मण हो या क्षत्रिय, वैश्य हो या शूद्र, वह किसी को भी अपने स्वार्थ के लिए छलने से पीछे नहीं हटता था।

कुछ समय में उसने छल और कपट से बहुत धन एकत्र कर लिया। लेकिन उस धन से उसके जीवन में न तो संतोष आया और न ही सुख।

धन बढ़ता गया, परंतु उसके भीतर का अंधकार भी उसी अनुपात में बढ़ता गया।

एक दिन देवराज किसी दूसरे नगर की ओर गया। वहाँ उसकी दृष्टि एक अत्यंत सुंदर वेश्या पर पड़ी, जिसका नाम शोभवती था। उस स्त्री के सौंदर्य ने उसके मन को पूरी तरह मोहित कर दिया।

देवराज पहले से ही विषय-वासनाओं में डूबा हुआ था। शोभवती के आकर्षण ने उसके भीतर छिपी आसक्ति को और प्रबल कर दिया। वह उसके मोह में ऐसा बंधा कि अपने घर, परिवार और कर्तव्यों की स्मृति तक भूल गया।

वह अपना सारा धन उस स्त्री पर खर्च करने लगा। धीरे-धीरे उसका संपूर्ण जीवन उसी के इर्द-गिर्द घूमने लगा।

उसके माता-पिता ने उसे रोकने का प्रयास किया। उन्होंने उसे उसके कर्तव्य और परिवार की मर्यादा का स्मरण कराया, लेकिन मोह में डूबे देवराज पर किसी बात का प्रभाव नहीं पड़ा।

वह दिन-रात उसी स्त्री के साथ रहने लगा। भोजन, विश्राम, मनोरंजन और विलास—उसका पूरा जीवन भोग में बदल गया।

मोह इतना बढ़ गया कि जिस धन को उसने वर्षों तक छल-कपट से एकत्र किया था, वह भी समाप्त होने लगा।

धन समाप्त होने के बाद भी उसकी इच्छाएँ समाप्त नहीं हुईं।

अब वह अपनी आवश्यकताओं और उस स्त्री के भोग-विलास के लिए दूसरों की संपत्ति पर दृष्टि रखने लगा। चोरी और छल उसके जीवन का हिस्सा बन गए।

उसका मन पाप में इतना डूब चुका था कि उसे अपने कर्मों के परिणाम का कोई भय नहीं रहा।

एक रात उसके भीतर का अंधकार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया।

वासना और धन के मोह में अंधे होकर उसने अपने ही माता-पिता और पत्नी की हत्या कर दी। उनके पास जो कुछ धन था, वह भी उसने छीन लिया।

यह उसके जीवन का सबसे भयानक पतन था।

जिस परिवार ने उसे जन्म दिया था, जिस घर ने उसे आश्रय दिया था और जिस पत्नी ने उसके जीवन में साथ निभाया था, उसी परिवार का विनाश उसने अपने हाथों से कर दिया।

हत्या के बाद भी उसके भीतर पश्चात्ताप उत्पन्न नहीं हुआ। वह उस स्त्री के मोह में इतना अंधा था कि अपने किए हुए अपराध की गंभीरता को भी समझ नहीं सका।

वह पापपूर्ण जीवन जीता रहा।

शराब और मांस का सेवन उसकी दिनचर्या बन गया। वह अपने जीवन की सारी मर्यादाएँ खो चुका था। ब्राह्मण होने का जन्मगत संस्कार भी उसके आचरण को रोक नहीं पा रहा था।

लेकिन मनुष्य चाहे कितना भी नीचे गिर जाए, उसके जीवन में परिवर्तन का द्वार कभी पूरी तरह बंद नहीं होता।

देवराज के जीवन में भी वह समय आने वाला था।

एक दिन वह घूमते-घूमते प्रयाग के निकट प्रतिष्ठानपुर पहुँचा। वहाँ उसने एक शिवालय देखा। मंदिर के भीतर अनेक साधु-महात्मा एकत्र होकर भगवान शिव की कथा सुन रहे थे।

देवराज उस स्थान पर कुछ समय के लिए ठहर गया।

उस समय उसके शरीर में तेज ज्वर था। अपराधों और पापों से भरा उसका जीवन अब बीमारी से भी घिर चुका था। वह अत्यंत दुर्बल हो गया था और चलने-फिरने की शक्ति भी कम हो गई थी।

शिवालय में बैठकर उसने पहली बार ध्यानपूर्वक शिवपुराण की कथा सुनी।

उसके जीवन में यह एक साधारण घटना नहीं थी।

जिस मनुष्य ने वर्षों तक धर्म से मुँह मोड़ रखा था, उसके कानों में अब भगवान शिव की कथा पड़ रही थी।

वह वहीं बैठा रहा।

शिवपुराण की कथा चलती रही और देवराज उसे सुनता रहा।

कथा के प्रत्येक प्रसंग के साथ उसके भीतर कहीं दबा हुआ संस्कार जागने लगा। उसके जीवन के पाप उसके सामने आने लगे। उसके द्वारा किए गए छल, हिंसा, माता-पिता और पत्नी की हत्या तथा विषय-वासनाओं में बिताया हुआ जीवन उसके मन पर धीरे-धीरे भारी पड़ने लगा।

शिवकथा उसके भीतर परिवर्तन का बीज बो चुकी थी।

कुछ समय बाद देवराज की मृत्यु हो गई।

उसके कर्मों के कारण यमदूत उसे अपने साथ ले जाने के लिए आए। उन्होंने उसे बाँध लिया और यमपुरी की ओर ले जाने लगे।

लेकिन उसी समय एक अद्भुत घटना घटी।

भगवान शिव के गण वहाँ प्रकट हुए।

उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी था। उनके हाथों में त्रिशूल थे और उनके शरीर पर भस्म सुशोभित थी। रुद्राक्ष उनके शरीर की शोभा बढ़ा रहे थे।

उन्होंने देवराज को यमदूतों के बंधन से मुक्त कर दिया।

यमदूतों और शिवगणों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। यमराज के दूतों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इतने पाप करने वाले मनुष्य की रक्षा भगवान शिव के गण क्यों कर रहे हैं।

लेकिन देवराज के जीवन में एक ऐसा पुण्य घट चुका था, जिसने उसके वर्षों के पापों पर विजय पा ली थी।

उसने शिवपुराण की कथा सुनी थी।

भगवान शिव की कथा का प्रभाव उसके अंतःकरण तक पहुँच चुका था।

धर्मराज के सामने भी यह स्पष्ट हो गया कि शिवपुराण की पवित्र कथा का श्रवण देवराज के लिए मुक्ति का कारण बन चुका था।

जिस मनुष्य ने जीवनभर अधर्म का मार्ग अपनाया था, वही अंततः शिवकथा के प्रभाव से भगवान शिव की शरण में पहुँच गया।

उसका जीवन इस सत्य का उदाहरण बन गया कि मनुष्य के कर्म चाहे कितने ही भारी क्यों न हों, सच्चे भाव से सुना गया शिवतत्त्व उसके भीतर परिवर्तन का मार्ग खोल सकता है।

देवराज का सांसारिक जीवन पाप से भरा था, लेकिन मृत्यु के अंतिम चरण में शिवपुराण की कथा उसके लिए मुक्ति का द्वार बन गई।

इस प्रकार एक पतित ब्राह्मण का अंत भगवान शिव की कृपा से हुआ और उसकी आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर शिवधाम की ओर चली गई।

यही शिवपुराण की महिमा थी—जो कथा केवल कानों तक पहुँचती हुई प्रतीत होती है, वह कभी-कभी मनुष्य के भाग्य और उसके जीवन की अंतिम दिशा तक बदल देती है।

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