ग्रन्थ-निलावंती एक रहस्य- Granth Neelavanti Ek Rahasya now on Amazon Kindle by Shrikant Vishwakarma

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ग्रन्थ-निलावंती एक रहस्य


लेखक : श्रीकांत विश्वकर्मा


shrikantvishwakarmaa@gmail.com


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Shrikant Vishwakarma is a passionate mythology and fantasy writer whose work bridges the timeless richness of Indian tradition with the imaginative depth of modern storytelling. Hailing from Bokaro and now based in Mumbai, he has steadily built a distinct voice that blends ancient legends, spiritual philosophy, and cinematic narrative style.

With a deep interest in Indian scriptures, folklore, and tantric traditions, Shrikant explores powerful themes such as destiny, devotion, supernatural forces, and the eternal conflict between good and evil. His storytelling often reimagines mythological characters and forgotten legends, giving them new life through gripping plots, emotional depth, and visual intensity.

He is also an experienced screenplay writer, having contributed to several television projects, where he honed his craft in character development, dramatic structure, and audience engagement. His creative vision extends beyond conventional narratives, often incorporating elements of mystery, horror, and epic fantasy into mythological frameworks.

Shrikant is the author of the novel “Chhota Vikram aur Bal Betal”, and is currently working on multiple ambitious projects, including mythological novels, web series concepts, and translations of ancient texts. His work reflects a commitment to preserving cultural heritage while presenting it in a compelling, accessible form for contemporary readers.

Through his writing, Shrikant Vishwakarma aims to take readers on immersive journeys into worlds where gods, spirits, and humans collide—revealing not just stories of the past, but truths that resonate deeply in the present.

 

ग्रन्थ-निलावंती एक रहस्य- Granth Neelavanti Ek Rahasya now on Amazon Kindle by Shrikant Vishwakarma

एक शापित और रहस्यमयी ग्रंथ नीलावंती, जिसे केवल सच्चा प्रेमी ही प्राप्त कर सकता है..एक निडर राजकुमार तेजसिंह को एक घातक यात्रा पर ले जाता है, जहाँ उसके हर बढ़ते कदम के साथ उस राजुमारी की जान खतरे में पड़ जाती है, जिससे वह प्रेम करता है।

  1. अध्याय 1: अँधेरी गुफा का रहस्य
  2. अध्याय 2: प्रेम की पहली परीक्षा
  3. अध्याय 3: बाइस साल बाद – अधूरी खोज
  4. अध्याय 4: अधूरा प्रेम
  5. अध्याय 5: नई पीढ़ी का जन्म
  6. अध्याय 6: भविष्यवाणी की माला
  7. अध्याय 7: नियति का टकराव
  8. अध्याय 8: छुपी पहचान, छुपा प्रेम
  9. अध्याय 9: सच्चाई का टकराव
  10. अध्याय 10: प्रेम बनाम युद्ध
  11. अध्याय 11: कैद और चाल
  12. अध्याय 12: प्रेम की चुनौती
  13. अध्याय 13: पहली कहानी – कीमत की शुरुआत
  14. अध्याय 14: (दूसरी कहानी / अगली कीमत
  15. अध्याय 15: पिशाच की कहानी – प्रेम की सीमा
  16. अध्याय 16: अंतिम मनके – जीवन और मृत्यु के बीच
  17. अध्याय 17: नीलावंती का निर्णय
  18. अध्याय 18: जीवन या मृत्यु


ग्रन्थ-निलावंती एक रहस्य- Granth Neelavanti Ek Rahasya now on Amazon Kindle by Shrikant Vishwakarma


ग्रन्थ नीलावंती – एक रहस्य

अध्याय 1: अँधेरी गुफा का रहस्य

एक ऐसी रात थी, जिसमें चाँद भी बादलों के पीछे छिपकर काँप रहा था। जंगल की गहराइयों में हवाएँ किसी अदृश्य आत्मा की तरह चीख रही थीं, और पेड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ ऐसे हिल रही थीं, मानो किसी अनजाने भय की ओर इशारा कर रही हों। उसी भयावह अँधेरे को चीरती हुई एक टिमटिमाती मशाल धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

मशाल पकड़े एक आदमी—नहीं, एक राजा। उसके शरीर पर कीचड़ सना हुआ था, साँसें भारी थीं, और आँखों में थकान के बावजूद एक अजीब-सी सनक जल रही थी। यह था राजा वीरेंद्र। उसके हर कदम के साथ जमीन पर कीचड़ की आवाज़ गूँजती—छप… छप… छप…। वह कई दिनों से भटक रहा था; भूख, प्यास और नींद जैसे उसके जीवन से समाप्त हो चुके थे। अब उसके लिए सिर्फ एक ही चीज़ मायने रखती थी—“ग्रन्थ नीलावंती…”

अचानक हवा थम गई। जंगल का शोर एकदम से शांत हो गया। इतनी गहरी खामोशी कि राजा को अपनी ही धड़कनें सुनाई देने लगीं—धक… धक… धक…। उसने मशाल ऊपर उठाई, और उसी क्षण उसकी आँखों के सामने एक विशाल गुफा का द्वार उभर आया। वह गुफा नहीं, मानो किसी मृत संसार का प्रवेशद्वार था।

उसके चारों ओर मानव कंकाल बिखरे पड़े थे—कुछ अधजले, कुछ टूटे हुए, और कुछ ऐसे जैसे मरने से पहले उन्होंने किसी भयानक चीज़ से बचने की कोशिश की हो। राजा के कदम एक पल को ठिठक गए, उसकी साँस अटक गई, लेकिन अगले ही क्षण उसकी आँखों में डर की जगह लालच चमक उठा।

यही है… यही वो जगह है…” वह बुदबुदाया।

वह धीरे-धीरे गुफा के भीतर बढ़ा। मशाल की काँपती रोशनी दीवारों पर अजीब आकृतियाँ बना रही थी—जैसे वे दीवारें जीवित हों और उसे देख रही हों। तभी भीतर से एक ठंडी हवा का झोंका आया, और मशाल की लौ बुरी तरह काँप उठी। उसी काँपती रोशनी में उसकी नजर गुफा के बीचों-बीच रखे एक पत्थर के चबूतरे पर पड़ी।

उस चबूतरे पर एक किताब रखी थी—लेकिन वह कोई साधारण किताब नहीं थी। उसका आवरण गहरे नीले रंग का था, जिस पर चमकती हुई रहस्यमयी लिपियाँ उकेरी गई थीं, जो हर पल बदलती प्रतीत होती थीं। ऐसा लगता था मानो वह किताब जीवित हो—साँस ले रही हो।

राजा की आँखें फैल गईं। उसके होंठ काँपे—“ग्रन्थ… नीलावंती…”

उसकी थकान और भय एक पल में समाप्त हो गए। अब उसके भीतर सिर्फ एक भावना शेष थी—पागलपन। वह तेजी से चबूतरे की ओर बढ़ा। उसके कदम अब भारी नहीं थे, बल्कि उतावले थे, जैसे कोई भूखा शिकारी अपने शिकार पर टूट पड़ता है।

उसने हाथ बढ़ाया—बस एक पल और…

तभी गुफा की दीवारों में एक गहरी, ठंडी और अमानवीय आवाज़ गूँज उठी—“रुक जाओ… मानव…”

राजा का हाथ हवा में ही ठहर गया। उसका शरीर जैसे पत्थर का हो गया। आवाज़ फिर गूँजी—“जिसे पाने के लिए तुम अपनी आत्मा तक खो चुके हो… क्या तुम उसके योग्य भी हो?”

राजा ने काँपते हुए चारों ओर देखा—“क… कौन है? सामने आओ!”

अचानक दीवारों पर परछाइयाँ हिलने लगीं। मशाल की लौ लंबी होकर काँपने लगी, और आवाज़ और निकट आ गई—“इस ग्रन्थ में खजानों का रहस्य है… भूत-प्रेतों को वश में करने के मंत्र हैं… और ऐसी शक्तियाँ हैं, जो इंसान को देवता बना सकती हैं…”

कुछ क्षणों का सन्नाटा छाया, फिर आवाज़ और भी ठंडी हो गई—“लेकिन इसे सिर्फ वही पा सकता है… जिसने सच्चा प्रेम किया हो…”

राजा की आँखों में एक पल के लिए झिझक उभरी, लेकिन अगले ही क्षण वह एक अजीब, खोखली हँसी हँस पड़ा—“मैंने किया है प्रेम!” उसने जोर से कहा, “मैंने अपनी रानी से सच्चा प्रेम किया है! मैं इस ग्रन्थ का हकदार हूँ!”

गुफा में फिर सन्नाटा छा गया, मानो कोई अदृश्य शक्ति उसे परख रही हो। फिर धीरे-धीरे चबूतरे पर रखी किताब अपने आप खुलने लगी। उसके पन्ने बिना हवा के ही पलटने लगे—फड़… फड़… फड़…

राजा की आँखों में लालच और गहरा गया। वह झपटकर किताब के पास पहुँचा और बिना सोचे-समझे पढ़ने लगा।

जैसे ही उसकी नजर शब्दों पर पड़ी, उसका चेहरा बदलने लगा। उसके होंठ सूख गए और आँखों में भय उतर आया। वह हकलाया—“न… नहीं… ये झूठ है…”

किताब के पन्नों पर लिखा था—
तुमने कभी प्रेम नहीं किया…
तुमने सिर्फ अधिकार चाहा…
तुमने सिर्फ स्वयं से प्रेम किया…”

राजा पीछे हटने लगा। उसकी साँसें तेज हो गईं—“नहीं… नहीं!”

तभी किताब के पन्नों से काली धुंध निकलने लगी। वह धुंध धीरे-धीरे आकार लेने लगी—पहले हाथ, फिर चेहरे, और अंततः भयानक भूत और चुड़ैलें। उनकी आँखें लाल थीं, चेहरे विकृत, और उनकी मुस्कान खून जमा देने वाली थी।

एक चुड़ैल उसके बिल्कुल पास आकर फुसफुसाई—“तू सच्चा प्रेमी नहीं है…”

दूसरी ने हँसते हुए कहा—“अब तुझे कीमत चुकानी होगी…”

राजा भागने को मुड़ा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। सैकड़ों अदृश्य हाथ उसे पकड़ चुके थे। वह चीखा—“बचाओ!!” लेकिन उसकी चीख गुफा की दीवारों में ही दबकर रह गई।

भूतों ने उसे घसीटना शुरू कर दिया—अँधेरे की ओर, एक ऐसे अँधेरे में जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।

आखिरी बार उसकी नजर उस किताब पर पड़ी, जो अब फिर से शांत होकर बंद हो चुकी थी—मानो कुछ हुआ ही न हो।

और फिर… सब कुछ शांत हो गया।

गुफा फिर से वैसी ही हो गई—सन्नाटे से भरी, मौत से लिपटी हुई।

बस एक फर्क था—अब वहाँ एक और कंकाल बढ़ चुका था।
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