भाग्य की कहानी -हिंदी लोक कथा - Hindi Kahaniyan

@Indian mythology
0

हिंदी कहानी   (Hindi kahani) हिंदी लोक कथा 




भाग्य की कहानी  (Bhagya ki kahani) 

  


सुखीपुर गाँव में शारदा देवी नाम की एक गरीब विधवा रहती थी जिसका एक पुत्र भी था - धनीराम. शारदा देवी ने बस अपना मन रखने के लिए ही  अपने बेटे का नाम धनीराम रख दिया था जबकि वो कई सालों से लोगों के जूठे बर्तन धोकर अपना और अपने बेटे का पेट पाल रही थी. 


शारदा को उम्मीद थी कि एक न एक दिन उसकी गरीबी के दिन ज़रूर चले जायेंगे. धनीराम जब कुछ बड़ा हुआ तो एक दिन उसने अपनी मां से पूछा मां हम इतने गरीब क्यों है? माँ ने इसे भगवान की इच्छा बता दी. 


बच्चे ने फिर कुछ पुछा तो माँ ने फिर कहा बेटा यह तो भगवान ही जाने. जिसके बाद धनीराम ने मन ही मन उसी क्षण इरादा बना लिया कि वो ईश्वर को ढूंढेगा और उससे पूछेगा कि आखिर हम इतने गरीब क्यों है?


बच्चे धनीराम ने जब कुछ लोगों से भगवान का पता पूछा तो उन्होंने धनीराम को मंदिर का पता बता दिया. धनीराम ने वहां कई बार भगवान को पुकारा मगर भगवान ने कोई जवाब नहीं दिया.


जिसके बाद धनीराम ने एक साधु को हवन करते देखा तो उनसे पुछा यह किसलिए? जब साधु ने कहा यह भगवान के लिए है तो धनीराम ने वहां भी भगवान को पुकारा मगर वहां भी भगवान नहीं आये. 


इसके बाद धनीराम ने कुछ पंडितों को गंगा में नहाकर आसमान की ओर हाथ जोड़कर पूजा करते देखा. धनीराम ने उनसे भी जाकर पुछा. उन पंडितों ने भी कहा यह भगवान के लिए हैं. जिसके बाद धनीराम ने भी गंगा में उतरकर वैसी ही कोशिश की. मगर वहां भी भगवान नहीं आये. 



लेकिन इसके बावजूद वह बच्चा धनीराम हार मानने वाला नहीं था. वह अब भगवान की खोज में घने वने में चला गया. कुछ देर बाद वो थक हारकर एक पत्थर की शीला पर बैठ गया और सोचने लगा कि भगवान तो यहां कहीं नहीं है आखिर गरीबी दूर कैसे होगी? 


तभी संयोगवश मृत्युलोक का भ्रमण करते हुए शिव-पार्वती उधर ही आ गए. उन्होंने जब एक बच्चे को वहां बैठा देखा तो उन्हें बड़ा अचरज हुआ कि वह अबोध बालक इस बीहड़ जंगल में क्यों बैठा है?

 

भगवान शिव ने बालक से पूछा तुम कौन हो बालक और इस जंगल में बैठे क्या कर रहे हो? धनीराम ने कहा मैं ईश्वर को ढूंढ रहा हूं? ईश्वर को? पार्वती ने चौक कर पूछ लिया. मगर ईश्वर से तुम्हें क्या काम है? बच्चे ने कहा मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि हम इतने गरीब क्यों है? दूसरों की तरह हम पर भी कृपा क्यों नहीं करते वो भगवान ? 


बच्चे ने जब भगवान खोजने की अपनी सारी कथा उन्हें कह  सुनाई तो मां पार्वती को उस बच्चे पर बहुत दया आ गयी. जिसके बाद उन्होंन भगवान शिव से मुखातिब होकर बोली प्रभु इस बालक का कुछ कीजिए? देखिये कितना निर्मल अबोध बच्चा है? 


महादेव ने कहा लेकिन भाग्य सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है देवी. इसलिए मैं कुछ नहीं कर सकता. भाग्य के देवता के अनुसार इसे अभी ऐसा ही जीवन भोगना होगा?


लेकिन देवी पार्वती ने जिद पकड ली आपको कुछ करना ही होगा प्रभु, इसे कुछ देना ही होगा आपको . महादेव ने कहा मैं इसे कुछ दे भी दूं तो भी उसका कोई लाभ नहीं होगा देवी. लेकिन इसके बावजूद पार्वती ने अपना हठ नहीं छोड़ा. 


जब पार्वती ने बहुत जिद पकड़ लो तो फिर भोले शंकर ने उस बच्चे धनीराम को एक मोतियों का हार दे दिया. हार पाकर धनीराम बहुत ही प्रसन्न हुआ और खुशी-खुशी अपने घर की ओर चल पड़ा. मां पार्वती संतुष्ट थी कि उन्होंने एक अबोध बालक की मदद की और अब उसके दिन सुख से कटेंगे. 


लेकिन त्रिकालदर्शी भोलेनाथ जानते थे कि वो हार उस बच्चे के पास रहेगा नहीं.


इधर चलते- चलते धनीराम को अचानक जोरो की प्यास लगी. उसने उस हार को एक पत्थर की शिला पर रखा और फिर नदी के जल को दोनों हाथों से उठाकर पीने लगा. इतने में तभी एक उड़ती हुई चील आयी और उस हार को उठाकर ले गई. धनीराम ने कुछ देर उस चील का पीछा भी किया मगर कोई लाभ नहीं हुआ. 


माता पार्वती से फिर उस बच्चे का दुःख देखा नहीं गया. उन्होंने फिर से भोलेनाथ से प्रार्थना कि वो इस बार भी उस बच्चे को कुछ अवश्य दे दे. भोलेनाथ ने पार्वती को फिर समझया कि अभी उस बच्चे के भाग्य में कुछ नहीं लिखा. लेकिन जब पार्वती ने पुन: जिद किया तो इस बार भोलेनाथ ने उसी रास्ते में सोने के सिक्कों से भरा एक कलश रख दिया जिस रस्ते धनीराम रोज़ शौच करने जाता था.

.
लेकिन उस दिन पता नहीं धनीराम को क्या सूझा कि उसने सोचा कि ये अंधे लोग आखिर शौच करने कैसे जाते होंगे. यही जानने के लिए धनीराम अपनी दोनों आखों को हथेलियों से ढककर आगे बढ़ने लगा जिस कारण उसे वो सोने से भरा कलश दिखाई नहीं दिया और वो आगे बढ़ गया . 


इस घटना के बाद पार्वती को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने महादेव से कहा आपने सच कहा स्वामी समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को नहीं कुछ नहीं मिलता. लेकिन फिर दुसरे ही दिन उस बच्चे के सामने उसी चील ने आकर मोतियों के हार को गिरा दिया. और शाम तक धनीराम को उसी रास्ते सोने से भरा कलश भी मिल गया जो अब तक वहीँ पड़ा था. पार्वती को यह बात समझ नहीं आयी. तब महादेव ने कहा कि यह उस बच्चे के भाग्य का नहीं अपितु  श्रम का फल है जिसे श्रम से वो भगवान को ढूंढ रहा था. 

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

Hi ! you are most welcome for any coment

एक टिप्पणी भेजें (0)