गमला चोर पर कविता ( Poem On flower base Gamla chor)

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गमला चोर पर कविता ( Poem On flower base Gamla chor)


गमला चोर : छोटी सोच का बड़ा शहर


देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान
कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इनसान
सूरज ना बदला चाँद ना बदला ना बदला आसमान
कितना बदल गया इंसान

भारत का नागरिक सपना देखता है
चीन, जापान, अमेरिका बनने का।
पर दिक़्क़त यह है कि
वह खुद अपनी सोच
गली–नुक्कड़ से बाहर नहीं निकाल पाता।

बड़े-बड़े शहर खड़े हो गए,
शीशे की इमारतें, चमचमाती सड़कें।
पर मानसिकता अब भी वहीं अटकी है,
जहाँ मौका मिले—वहीं जेब भर ली जाए।

शहर बड़ा, सोच छोटी,
ईमानदारी सबसे रूठी।
जहाँ गमले भी सुरक्षित नहीं,
वहाँ इंसान का क्या होगा, यही सही?

बड़े घर, बड़ी कारें,
नाम के आगे उपनाम भारी।
पर कर्म इतने हल्के कि
गमला उठा लेना भी चोरी नहीं लगती।

कार बड़ी, नाम बड़ा,
पर कर्म छोटा, सोच सड़ा।
फूल जो सबके लिए खिले,
वो भी लालच में छीने गए।

कैमरे ने चुपचाप सच लिख डाला,
VIP का नकाब खुद-ब-खुद उतार डाला।
कानून ने पूछा—“इतना घमंड क्यों?”
हँसकर जवाब आया—
“हम तो बस उठा रहे थे जनाब,
चोरी कौन?”

पर सवाल गमले का नहीं था,
सवाल सोच का था।
जो सार्वजनिक है,
वो मेरा भी है—
यही बीमारी का नाम था।

ये गमले नहीं,
हमारी सोच चुराई गई है।
ये फूल नहीं,
शर्म की जड़ उखाड़ी गई है।

जब गमला चोर सुर्ख़ी बने,
समझो समाज कहीं न कहीं हारे।
क्योंकि जो देश बनने चला था विश्वगुरु,
वह आज भी
गमले की चोरी पर
अपना चेहरा छुपा रहा है।

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