दुर्योधन का मंदिर कहाँ है ? क्यूँ होती है उसकी पूजा जानिये .

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रामायण की तरह महाभारत के सभी नायकों एवं पात्रों में पांडवों को भी सभी वन्दनीय मानते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि हमारे  देश में एक भू – भाग ऐसा भी है, जहाँ पांडवों (Pandavs) की निंदा तथा दुष्ट प्रकृति वाले कौरवों (Kaurvas) की पूजा होती है. 



दुर्योधन का मंदिर कहाँ है क्यूँ होती है उसकी पूजा जानिये .

उत्तराखंड के अंतर्गत एक लघु भू-भाग में पांडवों का घोर तिरस्कार किया जाता है और उन्हें शत्रु समझा जाता है तथा इसके विपरीत दुर्योधन (Duryodhana) को कुलदेवता की तरह पूजित किया जाता है. टेहरी- गढ़वाल और हिमाचल –प्रदेश की प्राकृतिम सीमा बनाती हुई एक विशाल उपत्यका है, जिसे (Ram dwari ghati) राम द्वारी घाटी कहते हैं. 


अपने आम के अनुरूप यह घाटी अत्यंत दुर्गम है और यहाँ पहुंचना अत्यधिक कष्टसाध्य है. इसी घाटी के नीचे भाग में टाँस नदी प्रभावित होती है. टाँस नदी आगे चलकर देहरादून  के समीप कालसी में यमुना में मिल जाती है. इसी नदी की घाटी में अल्प आबादी के लगभग दो दर्जन गाँव हैं. इन्ही गाँव में दुर्योधन (Duryodhna) को आराध्य इष्ट देव माना जाता है जहाँ दुर्योधन के पक्के मंदिर (Duryodhana's temple) बने हुए हैं, जहाँ विशेष अवसरों पर दुरोधन की विधिवत पूजा आयोजित होती है.


एक गाँव वाले दुर्योधन की मूर्ति (Statue of Duryodhana) को सुसज्जित करके पालकी में बैठाकर गाजे – बाजे के साथ नृत्य और गान करते हुए दुसरे गाँव ले जाते हैं. दुसरे गाँव वाले उसी उसी भांति आगे के गाँव में पहुंचा देते हैं. यह क्रम चलता रहता है. फिर एक निर्धारित गाँव में पहुँचने पर लोग मूर्ति का विशेष रूप से पूजन तथा सामूहिक रूप से नृत्य और गायन करते हैं. इसी तरह बस्तर के गोंडों की एक बड़ी शाखा रावण ( Ravan) की पूजा करती है. 


जैसे कि माना जाता है आदिम निवासियों की धार्मिक चेतना प्रतीक पूजा एवं सर्वचेतनावाद पर आधारित है.बन्दर , सांप , गरुड़ , मछली आदि जीव –जंतुओं के अलावे वे वृक्ष, एवं गुफा पत्थरों की पूजा किया करते थे. मानव मन में वे प्रतीक भय अथवा आश्चर्य पैदा करने मेंआदिम काल में सफल हुए. 


बिना आयुध के  आदिमानव का सिर इनके सामने भय अथवा श्रद्धा से झुक गया और उन्होंने अपने अविकसित मस्तिष्क से उनके पूजने का विधान प्रस्तुत किया. उन्हें ये भी विश्वास होने लगा था कि वृक्षों पर नाना प्रकार के  प्रेत निवास करते हैं. अत: पितृ पूजा , लिंग के प्रति श्रद्धा, नाग पूजा, वृक्ष पूजा, जीव -बलि नर-बलि तथा भूताविशेष से आराध्यों से संपर्क रखने की प्रथा आदि तो समझ में आती हैं, किन्तु महान आततायी राक्षस रावण और अत्यंत दुराचारी दुर्योधन की पूजा का कारण अगम्य-सा ज्ञात होता है. 


अधिक से अधिक यही हो सकता है कि दो समाज एक दुसरे के परस्पर विरोध में असुरों और दुर्जनों की पूजा शुरू कर दिए हो अन्यथा इनकी मूर्ति बनाकर कौन पूजा कर सकता है.    

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