चन्द्रदेव, शिव और सती के रिश्ते में क्या लगते हैं ?

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ब्रह्मा के मानस पुत्रों की उत्पत्ति और दक्ष की 60 कन्यों का विवाह 





सत्ययुग , त्रेता , द्वापर और कलियुग ये चार युग मिलकर चतुर्युग कहलाते हैं .सहस्त्रों चतुर्युग मिलकर एक कल्प बनता है .और कल्प के अंत में आती है महाप्रलय .इस समय संसार समाप्त हो जाता है . लेकिन जैसा कि सप्त ऋषि तारों को अमरता का वरदान प्राप्त हैं, वे हमेशा ब्रह्मांड में बने रहते हैं ताकि सभी को दिशा का ज्ञान हो सके . 



प्रलय काल के बाद  भगवान नारायण की नाभि से फिर से नए कमल की उत्पत्ति होती है जिसमे नए ब्रह्मा होते हैं और उस ब्रह्मा को फिर से  भगवान नारायण द्वारा नए संसार रचना का कार्य सौप दिया जाता है .एक बार ब्रह्मा को घमंड भी हो गया था .उन्हें लगता था कि इस संसार में केवल वही एक ब्रह्मा हैं .किन्तु जब भगवान नारायण ने ब्रह्मा को लाखों ब्रह्मा ,इद्र और सूर्य दिखा दिए तो फिर उनका अहेंकार समाप्त हुआ.


ब्रह्मा के मानस पुत्रों की उत्पत्ति .


सृष्टी को चलाने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने शरीर से जिन ऋषियों की उत्पत्ति की वे सभी मानस पुत्र कहलाये . ब्रह्मा जी की  गोद से देवर्षि नारद उत्पन्न हुए  ऋषि वशिष्ठ का उत्सर्जन ब्रह्मा जी के प्राण से हुआ . ऋषि भृगु ब्रह्मा की तवचा से अवतरित हुए. क्रतु ऋषि  ब्रह्मा के हाथ से बाहर आये . ऋषि पुलह,  ब्रह्मा की नाभि से प्रकट हुए . पुलस्त्य  ऋषि ब्रह्मा के कान निकले . ऋषि अंगीरा ब्रह्मा के मुख से , अत्री उनके नेत्रों से , मरीचि ब्रह्मा के मन से और दक्ष ब्रह्मा  जी के अंगूठे से अवतरित हुए थे .प्रजापति दक्ष की 60 पुत्रिओं में से  27 का विवाह चंद्रमा से किया गया . 10 पुत्रियाँ धर्म को दी गयीं .13 कन्याओं  को ऋषि कश्यप ने वरण किया   .4 को अरिष्टनेमि, 2 भृगु , 2 को क्रिश्च  और  2 अंगीरा और 1 कन्या सती का शिव के साथ विवाह हुआ. दक्ष चंद्रदेव को अधिक मानते थे इसके अलावे सृष्टी का सञ्चालन एक तरह से चन्द्र के प्रभाव में था इसलिए दक्ष ने अपनी 27 पुत्रिओं का विवाह चंद्रदेव से करवाया था. रोहिणी चन्द्रदेव की सबसे करीबी पत्नी थी जो सती की बहिन थी. इस नाते चन्द्रदेव का  सम्बन्ध भी सती और शिव से एक घरेलू रिश्ते का था .    


    

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